गोरख बोली सुनहु रे अवधू, पंचों पसर निवारी ,अपनी आत्मा एपी विचारो, सोवो पाँव पसरी,“ऐसा जप जपो मन ली | सोऽहं सोऽहं अजपा गई ,असं द्रिधा करी धरो ध्यान | अहिनिसी सुमिरौ ब्रह्म गियान ,नासा आगरा निज ज्यों बाई | इडा पिंगला मध्य समाई ||,छः साईं सहंस इकिसु जप | अनहद उपजी अपि एपी ||,बैंक नाली में उगे सुर | रोम-रोम धुनी बजाई तुर ||,उल्टी कमल सहस्रदल बस | भ्रमर गुफा में ज्योति प्रकाश || गगन मंडल में औंधा कुवां, जहाँ अमृत का वसा |,सगुरा होई सो भर-भर पिया, निगुरा जे प्यासा । ।,
बुधवार, 27 मई 2009
शबर मंत्र
ॐ नमो आदेश गुरु की. ओम्कारे आदि-नाथ, उदय-नाथ पारवती. सत्य-नाथ ब्रह्म. संतोष-नाथ विष्णुः, अचल अचम्भे-नाथ. गज-बेली गज-कन्थादी-नाथ, ज्ञान-परखी चौरंग्गी-नाथ. माया-रूपी मच्छेन्द्र-नाथ, जती-गुरु है गोरख-नाथ. घाट-घाट पिंडे व्यापी, नाथ सदा रहें सही. नवनाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई. ॐ नमो आदेश गुरु की..”
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